Stree Tum Jungle Ka Phool Ho | Shakuntala Meghwal | Hindi Poetry Collection

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स्त्री तुम जंगल का फूल हो – शकुंतला मेघवाल

"आज़ादी, ज्ञान, जिज्ञासाएँ, इच्छाएँ और अधिकार, ये सभी जितने पुरुषों के लिये आवश्यक हैं, उतने ही स्त्रियों के लिए भी!"

क्या वाकई हमारे समाज में आज भी स्त्रियों के ज्ञान और उसके अधिकारों को वह दर्जा और स्वतंत्रता मिल पाई है, जिनकी वे हकदार हैं? क्यों यह समाज बार-बार ‘तुम स्त्री हो’ का ठप्पा लगाकर उसकी प्रतिभा और सपनों को सीमित करने का प्रयास करता है?

'स्त्री तुम जंगल का फूल हो' केवल एक कविता संग्रह नहीं, बल्कि स्त्री चेतना, अस्मिता और उसके वजूद की मुखर आवाज़ है। यह संग्रह स्त्रियों की सामाजिक दशा, सुरक्षा और समकालीन राजनीति पर ध्यान केंद्रित करता है। यह पाठक को स्त्री के भीतर छिपे असीम प्रेम के साथ-साथ उसके उस अडिग साहस से भी अवगत कराता है, जो विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी उसे एक योद्धा के रूप में टिके रहने की शक्ति देता है।

साहित्य और समाज के मर्म को समझने वाले पाठकों एवं काव्य प्रेमियों के लिए एक अत्यंत संग्रहणीय व विचारोत्तेजक पुस्तक।

शकुंतला मेघवाल का जन्म बीकानेर (राजस्थान) में हुआ। उन्होंने अपनी सम्पूर्ण शिक्षा (विज्ञान और कला क्षेत्र) राजस्थान से प्राप्त की। जीवन के विभिन्न पड़ावों में वे जयपुर, जोधपुर, दिल्ली और विशेषकर मुंबई में रहीं, जहाँ उन्होंने दो दशकों से अधिक समय बिताया और जीवन को गहराई से समझा। यहीं उन्होंने प्रारंभिक बाल्य शिक्षा (ECCEd) का अध्ययन किया तथा अनेक सेमिनारों व शिक्षाविदों के साथ विचार-विमर्श का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में वे दिल्ली में रहकर अपना समय साहित्य साधना को समर्पित कर रही हैं। यात्राएँ करना, नए लोगों से मिलना और प्रकृति से जुड़ना उनकी प्रमुख रुचियाँ हैं।